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39 साल पुरानी बस्ती, घरों पर बुलडोजर चलने का डर

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मेरा घर 30 साल पहले बना था। काफी पुराना हो गया, तो सोचा नए सिरे से बनवा दूं। काम पूरा भी नहीं हुआ था कि घर तोड़ने के लिए सरकार का नोटिस आ गया। हमने तो सोचा था कि चमकते घर में दिवाली मनाएंगे, इस नोटिस ने हमारा त्योहार काला कर दिया।’

नॉर्थ दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले सतीश कुमार तिवारी के अलावा 800 और परिवारों की यही कहानी है। ये परिवार यहां के संगम विहार और झड़ौदा मजरा में रह रहे हैं। दिल्ली सरकार के लैंड एंड बिल्डिंग डेवलपमेंट डिपार्टमेंट ने इन लोगों को 19 नवंबर तक घर खाली करने का नोटिस दिया था, अगले दिन से यहां बुलडोजर चलना था।

17 नवंबर को हाईकोर्ट ने फिर सुनवाई की और 20 फरवरी 2024 तक कार्रवाई पर स्टे लगा दिया।

र्थ दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले सतीश कुमार तिवारी ने बताया कि 30 साल पहले बने घर को नए सिरे से बनवाने लगा, काम पूरा भी नहीं हुआ कि घर गिराने का नोटिस आ गया।

घर टूटने की तारीख तो आगे बढ़ गई, लेकिन सतीश जैसे लोगों के मन में डर अब भी है। पूरा मामला बंटवारे के वक्त पाकिस्तान से आए शोभत राम से जुड़ा है। उन्हें सरकार ने 1954 में बुराड़ी की ये 2 एकड़ जमीन दी थी।

2016 में शोभत राम के पोते नीरज ने हाईकोर्ट में याचिका लगाकर कहा कि उन्हें जमीन पर कब्जा नहीं मिला है। इस पर हाईकोर्ट ने संगम विहार और झड़ौदा मजरा की जमीन खाली कराने का आदेश दिया था।

कोर्ट के इस आदेश के बाद झड़ौदा और संगम विहार के लोग गुस्से में हैं। 9 नवंबर को दिल्ली सरकार ने उन्हें घर खाली करने का नोटिस दिया था। 14 नवंबर को लोगों ने वजीराबाद आउटर रिंग रोड पर जाम लगा दिया। उनका कहना है कि यहां 39 साल से लोग रह रहे हैं। जमीन की रजिस्ट्री है। बिजली, पानी का बिल भर रहे हैं। सीवर और प्रॉपर्टी का टैक्स दिया। घर खाली कराने वाले इतने दिन से कहां थे।

झड़ौदा में रहने वाले लोग अपने घरों की रजिस्ट्री के पेपर भी दिखाते हैं। लोग दावा करते हैं कि ये रजिस्ट्री 30-32 साल पहले हुई थी।

1993 में जमीन खरीदी थी, रजिस्ट्री भी हुई, ऐसे कैसे घर छोड़ दें
संगम विहार में रहने वाले सतीश कुमार तिवारी बताते हैं, ‘पिताजी ने 1993 में ये जमीन खरीदी थी। एक साल बाद 1994 में रजिस्ट्री कराई थी। मेरे बच्चों की शादी, पोते का जन्म सब यहीं हुआ।’

रजिस्ट्री के पेपर दिखाते हुए सतीश कहते हैं, ‘ये जमीन की रजिस्ट्री के पेपर हैं, जीवनभर की कमाई जोड़कर यहीं लगा दी है। अब ये घर चला गया, तो परिवार को कहां रखूंगा। कुछ समझ में नहीं आ रहा है। बुलडोजर आया, तो उसी के सामने लेट जाऊंगा, हम लोग और कर भी क्या सकते हैं।’

40 रुपए रोज में मजदूरी की, तब 50 गज का मकान बना
झड़ौदा मजरा में एंट्री करते ही पुलिसवाले नजर आने लगते हैं। लोग घरों के बाहर बैठकर नोटिस पर बात कर रहे हैं। 48 साल की मुन्नी यादव ने हमें रोक लिया। वे हमें संगम विहार में अपने घर ले गईं।

बुराड़ी के झड़ौदा मजरा में एंट्री करते ही बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी दिखाई दिए। 14 नवंबर को आउटर रिंग रोड पर लोगों ने जाम लगाया था, तब से इन्हें तैनात किया गया है।

मुन्नी कहती हैं, ‘40 रुपए रोज में मजदूरी करती थी। जब तक काम करती, बच्चे धूप में बैठे रहते थे। इतनी मेहनत करके 50 गज का मकान खरीदा था। तब मेरे पति की तनख्वाह 1500 रुपए महीने थी। इतने कम पैसों में 4 बच्चों को पाला। आप ही सोचिए, कितनी मुश्किल से ये घर खरीदा होगा।’

‘घर टूटने की जब से खबर सुनी है, एक घूंट पानी नहीं पिया जा रहा। पुलिस आएगी, तो सारे बच्चों को लेकर यहीं मर जाएंगे। सरकार से यही कहना है कि हमें इसी घर में दफन कर दे।’

मुन्नी कहती हैं, ‘यहां के पते पर वोटर ID बना है। पिछले साल पानी के कनेक्शन के लिए 10 हजार रुपए दिए थे। अब हमें बोल दिया कि हमारे घर अवैध हैं। 30-40 साल से जो रह रहा हो, उसे एक कागज देकर कैसे बोल देंगे कि तुमने कब्जा किया है।’

गांव की जमीन बेचकर घर बनाया, 32 साल से रह रहे
55 साल की राजेश कुमारी को भी मकान खाली करने का नोटिस मिला है। उनके परिवार में कोई कमाने वाला नहीं है। एक बेटा है, जो बीमार रहता है। इस वजह से कुछ काम भी नहीं कर पाता।

राजेश कहती हैं, ‘32 साल से यहां रह रही हूं। जब आई थी, तो कुछ भी नहीं था। कई किलोमीटर दूर से पानी लाते थे। अब सारी सुविधाएं हो गईं, तो घर टूटने वाला है। घर तोड़ने का नोटिस देने वाले 32 साल तक कहां थे।’

आंसू पोंछते हुए राजेश कहती हैं, ‘हम हरियाणा से हैं। गांव की जमीन बेचकर यहां घर खरीदा था। एक-एक रुपए जोड़कर इसे बनाया है। अगर पहले पता होता कि ये दिन आएगा, तो जीवनभर की पूंजी इसमें क्यों लगाते।’

कैसे पता चला कि आपका घर दूसरे की जमीन पर बना है? राजेश ने कहा, ‘कुछ दिन पहले 2-3 लोग आए थे। पुलिस भी साथ थी। किसी ने कुछ बताया नहीं, यहां जितने भी घर बने हैं, उनका नाप लेने लगे।’

‘बाद में पता चला कि जिसकी ये जमीन है, वो 50-60 साल से केस लड़ रहा था। अब उसके हक में फैसला आया है। हम 32 साल से यहां रह रहे हैं, अब तक वो सामने क्यों नहीं आया। गांव की जमीन बेच दी है, यहां घर नहीं रहेगा तो कहां जाएंगे।’पिटीशनर बोले- जमीन के असली मालिक किसान हैं, उन्होंने ही जमीन बेची थी
जमीन से कब्जा हटाने का नोटिस दिया, तो इसके खिलाफ संगम विहार और झड़ौदा के करीब 250 लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इनमें बुराड़ी में झड़ौदा के रहने वाले गुलाब मौर्य भी हैं। उन्होंने बताया कि यहां करीब 25-26 हजार लोग रहते हैं। कोर्ट के आदेश से इन पर असर पड़ेगा। हमने यही फैक्ट कोर्ट में रखा, तो मानवीय आधार पर 20 फरवरी 2024 तक स्टे मिल गया।

झड़ौदा और संगम विहार के करीब 800 मकानों में 24-25 हजार लोग रहते हैं। कोर्ट ने इसी मानवीय आधार पर 20 फरवरी तक किसी भी कार्रवाई पर रोक लगाई है।

गुलाब पूरा मामला समझाते हुए कहते हैं, ‘आप अभी जिस रोड से मेरे घर तक आए हैं, वो भी उसी जमीन का हिस्सा है। बिजली की लाइन, 2 बड़े नाले, पानी की पाइपलाइन सब कुछ यहां है। अगर हमारे घर हटाए जाएंगे, तो ये सब भी हटेगा क्या?’

जमीन का ये विवाद कैसे शुरू हुआ? गुलाब मौर्य बताते हैं, ‘यहां की जमीन के असल मालिक किसान थे। कुछ किसानों ने प्रॉपर्टी डीलरों के जरिए जमीन बेच दी, बाकी किसानों ने खुद जमीन का सौदा किया है। यहां जमीन की खरीद-फरोख्त 1980 के आसपास शुरू हुई थी।’

‘1984 तक यहां काफी लोग रहने लगे थे। इलाके के करीब 10% मकान उसी वक्त के हैं। 1995 के बाद सरकार ने सुविधाएं देनी शुरू कर दीं। बिजली के मीटर लगे, जल बोर्ड से पानी सप्लाई होने लगा। बाद में आधार कार्ड और वोटर कार्ड भी बन गए। 2016 तक किसी को भनक तक नहीं थी कि ये जमीन किसी और की है।’

जिस जमीन को लेकर विवाद है, वहां बने घरों का बिजली बिल भी आता है, लोगों का कहना है कि कई साल से हम सीवर और हाउस टैक्स भी जमा कर रहे हैं।

‘जिस जमीन पर विवाद है, उस पर नगर निगम का स्कूल है, सरकारी अस्पताल है। 9 नवंबर 2023 को दिल्ली सरकार के कर्मचारी घरों की मार्किंग करने आए, तब हमें पता चला कि ये जमीन किसी और की है। जमीन का मालिक तो कभी आया ही नहीं। वो तो कोर्ट में भटकता रहा। कोई अफसर भी यहां नहीं आया।’

दिल्ली सरकार ने 9 नवंबर को घर खाली करने का नोटिस दिया
दिल्ली सरकार के लैंड एंड बिल्डिंग डिपार्टमेंट ने 9 नवंबर 2023 को एक नोटिस जारी किया था। इसमें बताया है कि बुराड़ी के झड़ौदा मजरा में खसरा नंबर 28 और 29 में बने सभी मकान अवैध हैं।

इनमें रह रहे लोगों को 19 नवंबर तक घर खाली करने के लिए कहा गया था। नोटिस में लिखा है कि 20 नवंबर को इन घरों को तोड़ा जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने इस पर 20 फरवरी 2024 तक के लिए स्टे लगा दिया है।

दिल्ली सरकार ने 9 नवंबर को नोटिस दिया था, जिसमें 19 नवंबर तक घर खाली करने के लिए कहा था और 20 नवंबर को घर तोड़ने की बात कही थी।
दिल्ली सरकार ने 9 नवंबर को नोटिस दिया था, जिसमें 19 नवंबर तक घर खाली करने के लिए कहा था और 20 नवंबर को घर तोड़ने की बात कही थी।

1954 में रिफ्यूजी के लिए कानून बना, 1961 में पाकिस्तान से आए परिवार को जमीन मिली
बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भागकर भारत आए लोगों को भारत सरकार ने विस्थापित व्यक्ति (मुआवजा एवं पुनर्वास) अधिनियम 1954 के तहत जमीनें दी थीं। 1947 में शोभत राम भी पाकिस्तान के मोंटगोमेरी से दिल्ली आए थे। अब मोंटगोमेरी को साहीवाल कहा जाता है। ये पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में है।

शोभत को भारत सरकार ने पंजाब में कुछ जमीन दी थी। थोड़ी जमीन दिल्ली के आसपास देने का वादा किया गया। 1961 में शोभत के बेटे रामचंदर को झड़ौदा मजरा में 2 एकड़ जमीन मिली। रामचंदर इस मामले में कोर्ट चले गए और कहा कि ये इलाका बहुत वीरान है। उस पर कब्जा भी नहीं मिला है।

रामचंदर की याचिका पर 1995 में झड़ौदा की जमीन का अलॉटमेंट रद्द कर उन्हें महरौली में जमीन दे दी गई। महरौली में रामचंदर ने खेती शुरू कर दी। 1999 में सरकार ने उनसे ये जमीन वापस लेकर बुराड़ी में फिर जमीन दे दी। हालांकि, परिवार को इस पर कब्जा नहीं मिला।

शोभत के पोते नीरज ने 2016 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उनके परिवार को बुराड़ी में अब तक जमीन नहीं मिली है। कोर्ट ने नीरज को जमीन पर कब्जा दिलाने का आदेश दिया। इसके बाद सरकार ने बुराड़ी के झड़ौदा में मकान बना चुके लोगों को घर खाली करने का नोटिस दिया है।

हमने नीरज से कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई। एडवोकेट वरुण फोगाट उनका केस लड़ रहे हैं। हमने उसने बात की। वरुण कहते हैं, ‘मामला अभी कोर्ट में है। ऐसे में कोर्ट के बाहर कुछ भी बोलना ठीक नहीं होगा। कोर्ट का फैसला आने के बाद ही हम इस पर बोल सकते हैं।’

 

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